Saturday, June 23, 2012

KAAJAL

आज 10 साल बाद भी एक चेहरे को मैं नहीं भुला पाया मेरा और उस का कोई सम्बन्ध नहीं था , सिर्फ एक घंटे की मुलाकात में वो हंसी वो मासूमियत वो चंचलता जिन्दगी भर के लिए दिल पर छप गयी. किस को पता था कि एक घंटे में जिन्दगी में इतना बड़ा मोड़ आएगा। आज जो भी मैं सोचता हूँ या करता हूँ उसमें एक घंटे की मुलाकात का बहुत बड़ा हाथ है।

मेरे हाथों में एक कमल का फूल था जो में खुद तालाब से तोड़ के लाया था और वही ले कर मैं रेल्वे स्टेशन पर अपनी छोटी बहिन और भाई के साथ घर जाने के लिए ट्रेन का इन्तजार कर रहा था कि इतने में उसने आकर पुछा " ये किस का फूल है ?"
मैं ने कहा " कमल का."
 वो बोली " नहीं ये तो चमेली का फूल है, मुझे देगा क्या?"
मैंने मना करते हुए कहा " ये तो मैं अपने घर के लिए ले जा रहा हूँ लेकिन ये है कमल का ही, मैं खुद तोड़ के लाया हूँ ."
वो बोली " हमारे गाँव मैं तो इसे चमेली का बोलते है."
मैं ने पुछा "कहाँ  की रहने वाली हो तुम ?"
"बंगाल " तपाक से उत्तर आया .
 इतने में ही उस की हमउम्र सहेली आ कर बोली " भैया ये झूठ बोल रही है। ये तो यहीं रहती है।
मैं ने पुछा "तुमने झूठ क्यों बोला?"
वो बोली "हमें पकड़ के ले गया तो तू?"
मैं बोला "नहीं मैं क्यों पकड़ने लगा तुम्हे?"
 "लेकिन लोग अच्छे नहीं होते ना पकड़ लिया तो ?"
मैं ने कहा " डरो मत मैं नहीं पकडूँगा, लेकिन तुम्हारा नाम तो बताओ ?"
वो बोली " मेरा नाम पायल है इस का नाम रेखा है और ये मेरा छोटा भाई है इसका नाम राकेश है।"
तब तक उस का 3 - 4 साल का भाई भी फटे कपड़ो मैं हाथ मैं कटोरा लिए मेरे पास आ चुका था।
तभी रेखा फिर बोली " झूठ बोल रही है फिर से इस का नाम काजल है और मेरा नाम सरस्वती है।"
 मैं थोडा गुस्सा दिखाते हुए बोला " झूठ बोलोगी तो मैं तुम से बात नहीं करूँगा।
 तो काजल बोली " अच्छा सॉरी अब नहीं बोलेंगे झूठ।"
तभी मैं ने पुछा "तेरे भाई के कटोरे मैं कौन से भगवान  की तस्वीर है?"
वो मासूमियत से बोली " हमें क्या पता ये तो ऐसे ही एक पेड़ के नीचे मिल गयी थी लेकिन इसे देख  कर लोग  पैसे दे देते है।"
मैं -        कितने पैसे कमा लेती हो दिन भर में ?
काजल - 70 - 80 रूपये
मैं -         क्या करती हो पैसे का ?
काजल -  मम्मी को दे देते हैं।
मैं -         क्यों तुम्हारे पापा नहीं कमाते?
काजल -  वो तो घर छोड़ के भाग गया।
मैं -         मम्मी क्या करती हैं?
काजल - घर चलाती है ना।
हमें तब तक भूख लगने लगी थी क्यों की सुबह से कुछ नहीं खाया था तो सोचा की परांठे निकल के खा लें, मैं ने फिर काजल से पुछा - खाना खाएगी?
काजल - नहीं, हम तो खा के आये हैं।
मैं -        हम ने तो सुबह से नहीं खाया।
काजल - ओह, हम तो दिन मैं 3 बार खाते है सुबह 8 बजे फिर 12 बजे फिर शाम को और बीच मैं कोई खिला दे        
              तो वो अलग।
मैं( एक परांठा आचार से लगा के देते हुए) - फिर तो ये ले ले, एक बार और सही।
झिझकते हुए उस ने ले लिया और हम साथ बैठ कर खाते रहे और ढेर सारी बातें करते रहे। इतने मैं एक पढ़ा लिखा आदमी आया और तेज आवाज में काजल से बोला - "क्यों चिपक रहे हो इन लोगो से, भिखमंगों ! भागो यहाँ से।"
मैं एक दम से बोला - " भाईसाहब बात मैं कर रहा हूँ आप को कोई मतलब?"
वो आदमी मुझे घूरते हुए चला गया। हम खाना खा चुके थे लेकिन माहौल थोडा बदल गया था। मैं ने फिर बात शुरू करने की कोशिश कि
मैं -        कितने टाइम से भीख मांग रहे हो?
काजल - पता नहीं जब से छोटे थे तब से
(एक 8 साल की बच्ची बोल रही थी कि जब से छोटे थे तब से, पता नहीं वो कब छोटी थी और कब बड़ी हो के घर सम्भाल  ने लगी।)
मैं -        भीख क्यों मांगती हो?
काजल कुछ रूआसी हो गयी थी शायद ये सवाल उसे पसंद नहीं आया था उससे खड़ा रहना मुश्किल हो रहा था। दीवार का सहारा लगते हुए बोली - भीख माँगना कोई आचा लगता है क्या? (तुरंत चहकते हुए बोली) लेकिन जब मैं और मेरा भाई बड़े हो जायेंगे ना तो हम मजदूरी करेंगे और खूब कमाएंगे, भीख नहीं मांगेंगे।

शायद हम तीनों भाई बहिन की आँखों से भी 1 - 2 बूँद निकल आई थी,  इस बात को मैं ने और नहीं बढ़ाया, मैं ने पुछा - गिनती आती है?
काजल - 30 तक आती है।
मैं(आश्चर्य करते हुए) - फिर 70 - 80 कैसे गिन लेती हो?
काजल - अरे, 30 - 30 कर के गिन लेंगे ना इतना भी नहीं पता तुझे?
मैं(हँसते हुए) - हाँ, ठीक बोला सॉरी। लेकिन अब तुम 50 तक गिनती सीखना मैं अगली बार मिलूँगा तो पूछुंगा
काजल - ठीक है।

इतने मैं ट्रेन आ गयी, काजल और सरस्वती ने झट से चढ़ के हमारे लिए सीट रोक ली और हम आराम से बैठ गए तो नीचे उतर कर बोली - भैया, बाय तू बढ़िया आदमी है।
मैं - मैं तेरे लिए अगली बार किताब ले कर आऊंगा लेकिन 50 तक गिनती याद करेगी तब।

हमारी ट्रेन चल दी और वो दोनों बच्चियां दूर तक भागते हुए हमें बाय बोलती रही जैसे कोई बहुत गहरा रिश्ता हो। मैं सोचता रह गया कि इस भीख मांगने वाली 8 साल की बच्ची ने मुझसे 1 रुपया भी नहीं माँगा और बदले में कितना कुछ दे गयी।
मन मैं सोचता हूँ कि दोबारा भीख मांगते कभी ना मिले फिर भी नजरें उसे कोटा स्टेशन पर ढूँढती रहती है।











Wednesday, September 7, 2011

ab kis ko kahu main....

आज घर से न निकलता तो अच्छा होता 
राहों पे न चलता तो अच्छा होता
क्या पता था जो लोग मिले थे वो यूँ बिछुड़ जायेंगे 
उन लोगों से न मिलता तो अच्छा होता

आज एक डर सा बैठने लगा है 
इन धमाकों में हर अपना सा बिछुड़ने लगा है
हर सांस थमने लगी है, लहू बिखरने लगा है
 अब किस को कहू मैं, हर दिया तो बुझने लगा है







Saturday, September 3, 2011

ye kis kranti ki shuruvat hai??

ये किस तूफ़ान से पहले की बात है ??
ये किस क्रांति की शुरुवात है ??
क्या ये दुनिया को बदलने की बात है ??
या फिर खुद सुधरने की शुरुवात है ??

ये भीड़ क्यों जमा है ??
वो तख्त पर माइक ले के क्यों खड़ा है ??
क्यों आज नारों से देश गूंजा है ??
क्या ये हमारे अन्दर की आवाज है ??

ये किस तूफ़ान से पहले की बात है ??
ये किस क्रांति की शुरुवात है ??


Wednesday, August 10, 2011

हर पल एक कसक सी जागती है 
ये किस्मत उस पल को कहा ले भागती है

बीते पलों को याद किया करता हूँ 
आने वाले पलों के सपने बुना करता हूँ
फिर कभी हँसता हूँ तो कभी रोया करता हूँ
क्या पता किस पल मैं मौत आती है 
इंसान के इरादों को झोंक चली जाती है

सीख रहा हूँ कुछ इस पल में जीना 
इस पल में हँसना इस पल में खिलना 
इस पल में करता हूँ इस पल में पाता हूँ
इस पल में सपनों को साकार बनाता हूँ
इस पल में तुष्टि है इस पल में सृष्टि है
ये पल ही जीवन में खुशियों की घुट्टी है.

Wednesday, July 27, 2011

kaha kho gayi

सोचता हूँ वो हंसी कहाँ गयी.....
वो मुस्कुराहट वो ख़ुशी कहाँ गयी......
वो खुशबू भरी फिजा कहाँ गयी...
और बसंत मे भी पतझड़ कैसे हो गयी....

सोचता हूँ ये क्या खो गया....
वो अपना पन कहाँ रह गया...
वो जिन्दगी बेमानी क्यों लगने लगी...
और हर बात परेशानी क्यों बन ने लगी...

सोचता हूँ कहा से ढूँढ कर लाऊं.....
वो खुशियों की बारिश को कैसे बरसाऊ....
वो पतझड़ के पत्तो से फिर से बाग़ लगाऊ...
और फिर से जियूं फिर से मुस्कुराऊ......

Wednesday, March 16, 2011

Tuesday, October 5, 2010

देव आओ पर पहले बताओ

देव आओ, पर पहले बताओ
कौन तुम हो, देव क्यों हो ?
छाया हो या स्तंभ तुम हो ?
घेरे हो सृष्टि, वो आवरण तुम हो?
क्या सृष्टि से परे एक आश्चर्य तुम हो?
या सव्यम्भू सृष्टि तुम हो ?

देव आओ, पर पहले बताओ
क्या तुम अखंडित आत्मा हो?
क्या तुम अनश्वर चेतना हो?
प्रश्न हो या जवाब तुम हो?
मेरी गुत्थी पहले सुलझाओ

देव आओ पर पहले बताओ
उतरो जेहन में, मैं स्वागतातुर हूँ ।
खेलो हृदय में, मैं पुलकित मन हूँ ।
गाओ यहीं चाहे वीणा बजाओ ।
स्वर बनूँगा तुम राग लाओ।

देव आओ पर पहले बताओ॥

Wednesday, December 30, 2009

गुजारिश

ए खिलती हुयी कली सी, मेरे दिल की शहजादी
ए रोशन सी बाती, मेरे खयालो की मलिका

खोया हु तुझ में, ये जिन्दगी पाने के लिए
लाया हु तुझको अपना बनाने के लिए

ओ मुस्कुराती गुडिया तू जादू की पुडिया
बाँधी है तुझ से ये जिन्दगी की लडिया

एक पगलू सा लड़का हू संभालो मुझे
एक नन्हा सा परिंदा हू दो आशियाना मुझे

गुजारिश है तुम से बस इतना कर दो
रहो मेरे दिल में मेरे घर को स्वर्ग कर दो

Wednesday, December 9, 2009

पार्थ दीपक

हम दीपक है हम जलते है,
हम अन्धकार के तल पर है
हम है प्रकाश के पुन्यार्जक,
हम है सृष्टि के मार्गदर्शक
हम है अग्नि हम है ज्वाला,
हम उर्ध्वा गामी पथ की शाला
हम आलोकित हो धरती पर पहनते तेजस की जयमाला
हम पार्थ अभिनंदित दीप माला

Tuesday, March 24, 2009

khawab 2

ए खवाब मैं तुझ से क्या कहू
तू अगर मेरी जिन्दगी का हिस्सा न होता

ये रात इतनी खूबसूरत न होती
ये शाम किसी के इन्त्जारों मैं न गुजरती
वो समंदर पर महल न होता
वो बादलो पर कार न चलती
मछलियो के पर न लगते
पेडो के पैर न होते
ए खवाब मैं तुझ से क्या कहू
तू अगर मेरी जिन्दगी का हिस्सा न होता

ये फूल आपस मैं बाते न करते
ये चाँद काला चश्मा न पहनता
ये झरने पहाडो पर ऊपर न बहते
इन बारिश की बूंदों मैं छोटा सा संसार न होता
एक कागज़ की कश्ती मैं हम नदियों की सैर न करते
एक लकडी के घोडे पर गुड्डे की बारात न होती
ए खवाब मैं तुझ से क्या कहू
तू अगर मेरी जिन्दगी का हिस्सा न होता
तो ये जिन्दगी एक नीरस सी कहानी का हिस्सा होती
शुक्र गुजार हु तेरा
अगर तू मेरी जिन्दगी का हिस्सा न होता
मेरी मुस्कुराह्ट का कोई जरिया न होता.