Saturday, March 9, 2013

rajya v/s dharma satta


महाराणा प्रताप का वंश अपने आप को राजा नहीं  मानता था वे स्वयं को एकलिंगनाथ जी के चाकर और राज्य के व्यवस्थापक के रूप मैं देखते थे। गाँधी जी के प्रारंभ के दिनों का एक संस्मरण भी कुछ यही बात कहता है। वे दक्षिण भारत के एक राज्य ट्रेवन कोर मैं घुमते हुए एक किसान से पूछते हैं कि तुम्हारा राजा कौन है ? जवाब मैं किसान कहता है कि राजा कोई भी होगा पर असली राजा तो ऊपर वाला है।
एक विचार ये हो सकता है कि राजा का प्रजा के जीवन मैं बहुत हस्तक्षेप नहीं है, वह एक व्यवस्थापक है। समाज के अधिकतर कार्य समाज स्वयं ही देखता था चाहे वो शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, सेवा हो, सुरक्षा हो, नगर व्यवस्था हो या अन्य कोई महत्त्वपूर्ण कार्य।

अंग्रेजों के आने को शायद प्रारंभ मैं इसीलिए भारतीय जनता ने महत्व नहीं दिया होगा कि राजा कोई भी हो क्या ही फरक पड़ने वाला है पर जब उन के रोजमर्रा के जीवन मैं दखलंदाजी बढ़ी होगी या उन की मान्यताओ पर कुठाराघात हुआ होगा तो विरोध बाधा होगा। 

आज स्थिति अधिक विकट है। आधुनिकता ने परावलंबन की प्रकृति को बहुत बढ़ा दिया है। समाज राज्य सत्ता पर हद से अधिक निर्भर हो गया है। अंग्रेजो और उस के बाद के समय मैं व्यक्ति पहल करने और स्वयंसेवक बन ने से घबराने लगा है।राज्य सत्ता अपने आप को व्यवस्थापक से नियामक समझने लगी है और धर्मसत्ता का विलोपन होने लगा है। धर्मसत्ता विवेक और जीवन मूल्यों पर राज्य करती थी जिसके आगे राजा को भी झुकना होता था पर इस को भी ख़तम करने की कोशिश की गयी ताकि वे अपनी सत्ता बाधा सके। धर्मं सत्ता के विलोपन से राष्ट्र की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ह्रास हुआ है। समाज हर कार्य के लिए दुसरों पर निर्भर होता जा रहा है देखा जाए तो समाज की उद्यमिता क्षमता की बहुत बड़ी हानि हुयी है।

परन्तु समय फिर से बदलता नजर आ रहा है। समाज फिर से पहल करने लगा है, दुसरे शब्दों मैं ही सही परन्तु धर्मसत्ता की बात तो हो ही रही है। व्यक्तिगत स्वार्थ को हेय दृष्टि से देखने के साथ ही उस का विरोध भी हो रहा है जो की सामाजिक बदलाव का मापदंड हो सकता है। आधुनिकता के मापदंड भी कुछ बदलने लगे हैं। आशा है हम सही दिशा मैं गमन करें। 

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