Wednesday, July 27, 2011

kaha kho gayi

सोचता हूँ वो हंसी कहाँ गयी.....
वो मुस्कुराहट वो ख़ुशी कहाँ गयी......
वो खुशबू भरी फिजा कहाँ गयी...
और बसंत मे भी पतझड़ कैसे हो गयी....

सोचता हूँ ये क्या खो गया....
वो अपना पन कहाँ रह गया...
वो जिन्दगी बेमानी क्यों लगने लगी...
और हर बात परेशानी क्यों बन ने लगी...

सोचता हूँ कहा से ढूँढ कर लाऊं.....
वो खुशियों की बारिश को कैसे बरसाऊ....
वो पतझड़ के पत्तो से फिर से बाग़ लगाऊ...
और फिर से जियूं फिर से मुस्कुराऊ......