अप्पो दीपो भव
सब एक दुसरे को दोष देने
मैं लगे हुए है, आम आदमी बोल रहा है कि पुलिस सिस्टम ख़राब है, विपक्ष बोल
रहा है कि सरकार कुछ नहीं कर रही, नेता बोल रहे है कि लडकियाँ लड़कों को
उत्तेजित करती है और इस से ये सब हो रहा है। हर दिन कुछ लड़कियों और लड़कों
कि इज्जत लुट जाती है। समाज हल्ला मचाता है, नारी मुक्ति मोर्चा और
मानवाधिकार वाले नारे लगाते है, नेता लोग संसद मैं आवाज उठाते है, न्यूज़
चैनल इस मुद्दे को साबुन तेल की तरह बेच रहे है, अखबारों को कुछ नए टाइप कि
ख़बरें मेन पेज पर छापने के लिए मिल गयी है, भारत के युवाओं को फेसबुक पर
टाइम वेस्ट करने का एक और तरीका मिल गया है, सरकार खुश है कि लोगों का
ध्यान अब
घोटालों, आतंकवाद, महंगाई और दंगों से हट के नए मुद्दे पर चला गया है।
दुःख
तो इस बात का है कि इन सब शोशे बाजी में असली बात कहीं खो गयी है, इस
दोषारोपन मैं मूल कारण की खोज बंद हो गयी है, समाज शोर्ट टर्म मैमोरी लॊस
का शिकार हो गया है किसी समस्या के निवारण कि जगह सिर्फ उस समस्या पर ही
चर्चा हो रही है और कुछ दिन बाद दूसरी समस्या पर चर्चा और इसी प्रकार समाज
आगे बढ़ रहा है, पता नहीं आगे भी बढ़ रहा है या पीछे ही जा रहा है। कुछ लोग
सत्ता को जिम्मेदार मानते है कुछ लोग समाज व्यवस्था को इस का दोष देते हैं,
हम ने अन्दर झांकना बंद कर दिया है। नया भारत गढ़ने चले थे पता नहीं क्या
गढ़ने लगे हैं? विकास की सीढ़ी पर पैर रखने की जगह विनाश की सीढ़ी पर चढ़ने लगे
हैं।
यहाँ पे मुझे दो बातें समझ मैं आ रही है पहली ये कि कहीं
हमारे मन मैं जो इंसान की अवधारणा है वो गलत तो नहीं? हम जिस इंसान को एक
सामाजिक सभ्य प्राणी समझते है कही वो समाज मैं रहने का एक ढोंग ही तो नहीं
कर रहा? सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए समाज का हिस्सा बन गया हो और जब अन्दर
से कुछ कुलबुलाहट हुयी तो सारे नियमों को ताक मैं रख कर कर ली अपनी मनमानी?
या दूसरी बात ये कि हमारी ये व्यवस्था इंसान का निर्माण सही ढंग से नहीं
कर पा रही? स्वायत्तता के नाम पे स्वछंदता सिखा रही है? इंसान को पता ही
नहीं है कि असली सुख क्या है? हम असली सुख को ढूँढ ही नहीं पा रहे हैं। बस
तृष्णा को सुख मान के सारा समाज काम कर रहा है, किसी को धन की तृष्णा है,
किसी को रुतबे की, किसी को पॉवर की, किसी को शारीरिक सुख की तो किसी को
अपने अहंकार को पुष्ट करने की तृष्णा है। समाज भी इस तृष्णा का शिकार हो
गया है।
अब समय आ गया है अगर इस से ऊपर उठ के नहीं सोचा गया तो फिर
हम सोचने लायक भी नहीं रह जायेंगे। देश के प्रबुद्ध जन, नीति निर्माता,
नेता और सभी धर्मों एवं पंथों के पथ प्रदर्शकों को एक मंच पर लाना होगा।
शिक्षा के उद्देश्यों को फिर से देखना होगा और उन्हें अम्ल मैं लाना होगा,
कहाँ हम से गलती हो रही है पुनः मूल्याङ्कन करना होगा। ये भारत के आत्म
परिक्षण की घडी है, हम सब को खुद के अन्दर झाँक के देखना पड़ेगा बाहर कुछ
नहीं मिलेगा भारत को खुद का निर्माण खुद ही करना होगा फिर से कहना होगा
"अप्पो दीपो भव".