माँ मुझको तू एक सिखा दे।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।
हिन्दू बना मैं सिख बना
मुस्लिम और इसाई बना हूँ।
हर पल टूटा हर क्षण बिखरा
कभी क्या मैं जुड़ पाया हूँ?
माँ मुझको तू एक सिखा दे।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।
फूल बना मैं काँटा बना
मिट्टी का कण कण बना हूँ।
हर पल बदला हर क्षण उड़ता ,
कभी क्या मैं रुक पाया हूँ ?
माँ मुझको तू एक सिखा दे।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।
धुप बना मैं छाया बना
पल पल में,मैं भाप बना हूँ।
फिर भी मुझ में एक कमी है
मैं बूँद कहाँ बन पाया हूँ।
माँ मुझको तू एक सिखा दे।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।
हिन्दू बना मैं सिख बना
मुस्लिम और इसाई बना हूँ।
हर पल टूटा हर क्षण बिखरा
कभी क्या मैं जुड़ पाया हूँ?
माँ मुझको तू एक सिखा दे।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।
फूल बना मैं काँटा बना
मिट्टी का कण कण बना हूँ।
हर पल बदला हर क्षण उड़ता ,
कभी क्या मैं रुक पाया हूँ ?
माँ मुझको तू एक सिखा दे।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।
धुप बना मैं छाया बना
पल पल में,मैं भाप बना हूँ।
फिर भी मुझ में एक कमी है
मैं बूँद कहाँ बन पाया हूँ।
माँ मुझको तू एक सिखा दे।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।