ए खवाब मैं तुझ से क्या कहू
तू अगर मेरी जिन्दगी का हिस्सा न होता
ये रात इतनी खूबसूरत न होती
ये शाम किसी के इन्त्जारों मैं न गुजरती
वो समंदर पर महल न होता
वो बादलो पर कार न चलती
मछलियो के पर न लगते
पेडो के पैर न होते
ए खवाब मैं तुझ से क्या कहू
तू अगर मेरी जिन्दगी का हिस्सा न होता
ये फूल आपस मैं बाते न करते
ये चाँद काला चश्मा न पहनता
ये झरने पहाडो पर ऊपर न बहते
इन बारिश की बूंदों मैं छोटा सा संसार न होता
एक कागज़ की कश्ती मैं हम नदियों की सैर न करते
एक लकडी के घोडे पर गुड्डे की बारात न होती
ए खवाब मैं तुझ से क्या कहू
तू अगर मेरी जिन्दगी का हिस्सा न होता
तो ये जिन्दगी एक नीरस सी कहानी का हिस्सा होती
शुक्र गुजार हु तेरा
अगर तू मेरी जिन्दगी का हिस्सा न होता
मेरी मुस्कुराह्ट का कोई जरिया न होता.