Saturday, July 14, 2012

haar ke jeeto....

मुश्किलों को हौसले से जीतो
बुराई को अच्छाइयों से जीतो
इंसान को इंसानियत से जीतो
पर किसी ओर को  जीतना इतना जरुरी नहीं
पहले  आप को जीतो
और कभी-कभी हार के भी जीतो।

Friday, July 13, 2012

O rain

ए बारिश तू मत बरस
उन बिन कपड़ो के लोगो को देख
वो कचरे के ढेर में कुछ ढूँढ़ते बच्चो को देख
प्लास्टिक की छतों के नीचे रहने वाले लोगो को देख
वो खुले में सड़ते अनाज को देख
उस भूख से मरती आवाज को देख
क्या तुझे भी बेघर, बेसहारा लोगों को देख दया नहीं आती?
क्या तुझे भी बिना कपड़ो वाले सूखे शरीरों को देख दया नहीं आती?

ए बारिश तू फिर बरस
उन नालों पे बड़े घर बनाने वालो पे बरस
उन जंगलों को काट कर बेचने वालो पे बरस
उन वहशियों की बढती दरिंदगी से पहले
ए बारिश तू फिर बरस
मिटा दे उन लोगों को बहा दे उन अतिक्रमणों को
जो किसी दुसरे इंसान की छाती पे हुआ हो।


Monday, July 9, 2012

vyakulta ka khel (Game of anxiety)

विनाश काले विपरीत बुद्धि कहूँ या हर पल की अनिश्चितता से व्याख्या करूँ। जैसे ही मैंने स्टेशन पर कदम रखा दयोदया एक्सप्रेस रूकती सी लगी, ये उसका स्टोपेज नहीं था फिर भी मैंने सोचा की सिग्नल नहीं मिला होगा पर शायद कहानी कुछ और ही थी। इतने मैं ट्रेन फिर से चलने लगी और एक महिला और उस की बेटी ट्रेन मैं चढ़ने की कोशिश करने लगे, ट्रेन के साथ भागने लगे, उनके साथ जो भी आदमी था वो पहले ही चढ़ चूका था।

ट्रेन की स्पीड बढ़ गयी थी वो महिला चढ़ नहीं पायी थी और न ही उसकी बेटी। महिला ने ट्रेन के साथ भागना स्टार्ट कर दिया। 1 -2 बार ट्रेन की चपेट मैं आने से बची या यों कहो कि बेटी और ट्रेन पर खड़े लोगों ने बचा लिया लेकिन वो बदहवास सी भागती ही रही, ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म छोड़ चुकी थी। वो माँ बेटी अब भी भाग रहे थे इस आशा मैं कि ट्रेन की कोई चैन खीचें तो वे चढ़ जाए इतने मैं ट्रेन फिर धीमी हो गयी वो नजर आ रही थी पर थोडा दूर से और यकायक बहुत साड़ी भीड़ ट्रेन की तरफ भागी कौतुहल वश हम लोग भी देख रहे थे।

जब नजदीक जा के देखा तो आँखे फटी की फटी रह गयी। वह आदमी जो शायद महिला का पति था वो जमीन पर गिरा पड़ा है, उसका सर फट गया है और शरीर क्षत विक्षत सा पड़ा है। अपनी पत्नि और बेटी को इस तरह से दोड़ता हुआ देख शायद अपना मानसिक संतुलन नहीं बनाये रख पाया और चलती ट्रेन से कूद गया पर शायद हमेशा के लिए बिछुड़ गया। अब बस खून, आंसू, चीख पुकार और एक मारा हुआ शरीर सामने था।

कभी पढ़ा था की विधि का विधान कोई नहीं टाल सकता पर दूसरी और लगा की मन की व्याकुलता ने कितना बड़ा खेल खेल लिया।