विनाश काले विपरीत बुद्धि कहूँ या हर पल की अनिश्चितता से व्याख्या करूँ। जैसे ही मैंने स्टेशन पर कदम रखा दयोदया एक्सप्रेस रूकती सी लगी, ये उसका स्टोपेज नहीं था फिर भी मैंने सोचा की सिग्नल नहीं मिला होगा पर शायद कहानी कुछ और ही थी। इतने मैं ट्रेन फिर से चलने लगी और एक महिला और उस की बेटी ट्रेन मैं चढ़ने की कोशिश करने लगे, ट्रेन के साथ भागने लगे, उनके साथ जो भी आदमी था वो पहले ही चढ़ चूका था।
ट्रेन की स्पीड बढ़ गयी थी वो महिला चढ़ नहीं पायी थी और न ही उसकी बेटी। महिला ने ट्रेन के साथ भागना स्टार्ट कर दिया। 1 -2 बार ट्रेन की चपेट मैं आने से बची या यों कहो कि बेटी और ट्रेन पर खड़े लोगों ने बचा लिया लेकिन वो बदहवास सी भागती ही रही, ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म छोड़ चुकी थी। वो माँ बेटी अब भी भाग रहे थे इस आशा मैं कि ट्रेन की कोई चैन खीचें तो वे चढ़ जाए इतने मैं ट्रेन फिर धीमी हो गयी वो नजर आ रही थी पर थोडा दूर से और यकायक बहुत साड़ी भीड़ ट्रेन की तरफ भागी कौतुहल वश हम लोग भी देख रहे थे।
जब नजदीक जा के देखा तो आँखे फटी की फटी रह गयी। वह आदमी जो शायद महिला का पति था वो जमीन पर गिरा पड़ा है, उसका सर फट गया है और शरीर क्षत विक्षत सा पड़ा है। अपनी पत्नि और बेटी को इस तरह से दोड़ता हुआ देख शायद अपना मानसिक संतुलन नहीं बनाये रख पाया और चलती ट्रेन से कूद गया पर शायद हमेशा के लिए बिछुड़ गया। अब बस खून, आंसू, चीख पुकार और एक मारा हुआ शरीर सामने था।
कभी पढ़ा था की विधि का विधान कोई नहीं टाल सकता पर दूसरी और लगा की मन की व्याकुलता ने कितना बड़ा खेल खेल लिया।