Tuesday, December 18, 2012

अप्पो दीपो भव

                                                                  अप्पो दीपो भव
सब एक दुसरे को दोष देने मैं लगे हुए है, आम आदमी बोल रहा है कि पुलिस सिस्टम ख़राब है, विपक्ष बोल रहा है कि सरकार कुछ नहीं कर रही, नेता बोल रहे है कि लडकियाँ लड़कों को उत्तेजित करती है और इस से ये सब हो रहा है। हर दिन कुछ लड़कियों और लड़कों कि इज्जत लुट जाती है। समाज हल्ला मचाता है, नारी मुक्ति मोर्चा और मानवाधिकार वाले नारे लगाते है, नेता लोग संसद मैं आवाज उठाते है, न्यूज़ चैनल इस मुद्दे को साबुन तेल की तरह बेच रहे है, अखबारों को कुछ नए टाइप कि ख़बरें मेन पेज पर छापने के लिए मिल गयी है, भारत के  युवाओं को फेसबुक पर टाइम वेस्ट करने का एक और तरीका मिल गया है, सरकार खुश है कि लोगों का ध्यान अब
घोटालों, आतंकवाद, महंगाई और दंगों से हट के नए मुद्दे पर चला गया है।

दुःख तो इस बात का है कि इन सब शोशे बाजी में असली बात कहीं खो गयी है, इस दोषारोपन मैं मूल कारण की खोज बंद हो गयी है, समाज शोर्ट टर्म मैमोरी लॊस का शिकार हो गया है किसी समस्या के निवारण कि जगह सिर्फ उस समस्या पर ही चर्चा हो रही है और कुछ दिन बाद दूसरी समस्या पर चर्चा और इसी प्रकार समाज आगे बढ़ रहा है, पता नहीं आगे भी बढ़ रहा है या पीछे ही जा रहा है। कुछ लोग सत्ता को जिम्मेदार मानते है कुछ लोग समाज व्यवस्था को इस का दोष देते हैं, हम ने अन्दर झांकना बंद कर दिया है। नया भारत गढ़ने चले थे पता नहीं क्या गढ़ने लगे हैं? विकास की सीढ़ी पर पैर रखने की जगह विनाश की सीढ़ी पर चढ़ने लगे हैं।

यहाँ पे मुझे दो बातें समझ मैं आ रही है पहली ये कि कहीं हमारे मन मैं जो इंसान की अवधारणा है वो गलत तो नहीं? हम जिस इंसान को एक सामाजिक सभ्य प्राणी समझते है कही वो समाज मैं रहने का एक ढोंग ही तो नहीं कर रहा? सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए समाज का हिस्सा बन गया हो और जब अन्दर से कुछ कुलबुलाहट हुयी तो सारे नियमों को ताक मैं रख कर कर ली अपनी मनमानी? या दूसरी बात ये कि हमारी ये व्यवस्था इंसान का निर्माण सही ढंग से नहीं कर पा रही? स्वायत्तता के नाम पे स्वछंदता सिखा रही है? इंसान को पता ही नहीं है कि असली सुख क्या है? हम असली सुख को ढूँढ ही नहीं पा रहे हैं। बस तृष्णा को सुख मान के सारा समाज काम कर रहा है, किसी को धन की तृष्णा है, किसी को रुतबे की, किसी को पॉवर की, किसी को शारीरिक सुख की तो किसी को अपने अहंकार को पुष्ट करने की तृष्णा है। समाज भी इस तृष्णा का शिकार हो गया है।

अब समय आ गया है अगर इस से ऊपर उठ के नहीं सोचा गया तो फिर हम सोचने लायक भी नहीं रह जायेंगे। देश के प्रबुद्ध जन, नीति निर्माता, नेता और सभी धर्मों एवं पंथों के पथ प्रदर्शकों को एक मंच पर लाना होगा। शिक्षा के उद्देश्यों को फिर से देखना होगा और उन्हें अम्ल मैं लाना होगा, कहाँ हम से गलती हो रही है पुनः मूल्याङ्कन करना होगा। ये भारत के आत्म परिक्षण की घडी है, हम सब को खुद के अन्दर झाँक के देखना पड़ेगा बाहर कुछ नहीं मिलेगा भारत को खुद का निर्माण खुद ही करना होगा फिर से कहना होगा "अप्पो दीपो भव".

Wednesday, August 22, 2012

main ek nahi ban paaya hu

माँ मुझको तू एक सिखा दे।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।

हिन्दू बना मैं सिख बना
मुस्लिम और इसाई बना हूँ।
हर पल टूटा हर क्षण बिखरा
कभी क्या मैं जुड़ पाया हूँ?

माँ मुझको तू एक सिखा दे।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।

फूल बना मैं काँटा बना
मिट्टी का कण कण बना हूँ।
हर पल बदला हर  क्षण उड़ता ,
कभी क्या मैं रुक पाया हूँ ?

माँ मुझको तू एक सिखा दे।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।

धुप बना मैं छाया बना
पल पल में,मैं भाप बना हूँ।
फिर भी मुझ में  एक कमी है
मैं बूँद कहाँ बन पाया हूँ।

माँ मुझको तू एक सिखा दे।
मैं एक नहीं बन पाया हूँ।


Saturday, July 14, 2012

haar ke jeeto....

मुश्किलों को हौसले से जीतो
बुराई को अच्छाइयों से जीतो
इंसान को इंसानियत से जीतो
पर किसी ओर को  जीतना इतना जरुरी नहीं
पहले  आप को जीतो
और कभी-कभी हार के भी जीतो।

Friday, July 13, 2012

O rain

ए बारिश तू मत बरस
उन बिन कपड़ो के लोगो को देख
वो कचरे के ढेर में कुछ ढूँढ़ते बच्चो को देख
प्लास्टिक की छतों के नीचे रहने वाले लोगो को देख
वो खुले में सड़ते अनाज को देख
उस भूख से मरती आवाज को देख
क्या तुझे भी बेघर, बेसहारा लोगों को देख दया नहीं आती?
क्या तुझे भी बिना कपड़ो वाले सूखे शरीरों को देख दया नहीं आती?

ए बारिश तू फिर बरस
उन नालों पे बड़े घर बनाने वालो पे बरस
उन जंगलों को काट कर बेचने वालो पे बरस
उन वहशियों की बढती दरिंदगी से पहले
ए बारिश तू फिर बरस
मिटा दे उन लोगों को बहा दे उन अतिक्रमणों को
जो किसी दुसरे इंसान की छाती पे हुआ हो।


Monday, July 9, 2012

vyakulta ka khel (Game of anxiety)

विनाश काले विपरीत बुद्धि कहूँ या हर पल की अनिश्चितता से व्याख्या करूँ। जैसे ही मैंने स्टेशन पर कदम रखा दयोदया एक्सप्रेस रूकती सी लगी, ये उसका स्टोपेज नहीं था फिर भी मैंने सोचा की सिग्नल नहीं मिला होगा पर शायद कहानी कुछ और ही थी। इतने मैं ट्रेन फिर से चलने लगी और एक महिला और उस की बेटी ट्रेन मैं चढ़ने की कोशिश करने लगे, ट्रेन के साथ भागने लगे, उनके साथ जो भी आदमी था वो पहले ही चढ़ चूका था।

ट्रेन की स्पीड बढ़ गयी थी वो महिला चढ़ नहीं पायी थी और न ही उसकी बेटी। महिला ने ट्रेन के साथ भागना स्टार्ट कर दिया। 1 -2 बार ट्रेन की चपेट मैं आने से बची या यों कहो कि बेटी और ट्रेन पर खड़े लोगों ने बचा लिया लेकिन वो बदहवास सी भागती ही रही, ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म छोड़ चुकी थी। वो माँ बेटी अब भी भाग रहे थे इस आशा मैं कि ट्रेन की कोई चैन खीचें तो वे चढ़ जाए इतने मैं ट्रेन फिर धीमी हो गयी वो नजर आ रही थी पर थोडा दूर से और यकायक बहुत साड़ी भीड़ ट्रेन की तरफ भागी कौतुहल वश हम लोग भी देख रहे थे।

जब नजदीक जा के देखा तो आँखे फटी की फटी रह गयी। वह आदमी जो शायद महिला का पति था वो जमीन पर गिरा पड़ा है, उसका सर फट गया है और शरीर क्षत विक्षत सा पड़ा है। अपनी पत्नि और बेटी को इस तरह से दोड़ता हुआ देख शायद अपना मानसिक संतुलन नहीं बनाये रख पाया और चलती ट्रेन से कूद गया पर शायद हमेशा के लिए बिछुड़ गया। अब बस खून, आंसू, चीख पुकार और एक मारा हुआ शरीर सामने था।

कभी पढ़ा था की विधि का विधान कोई नहीं टाल सकता पर दूसरी और लगा की मन की व्याकुलता ने कितना बड़ा खेल खेल लिया।

Saturday, June 23, 2012

KAAJAL

आज 10 साल बाद भी एक चेहरे को मैं नहीं भुला पाया मेरा और उस का कोई सम्बन्ध नहीं था , सिर्फ एक घंटे की मुलाकात में वो हंसी वो मासूमियत वो चंचलता जिन्दगी भर के लिए दिल पर छप गयी. किस को पता था कि एक घंटे में जिन्दगी में इतना बड़ा मोड़ आएगा। आज जो भी मैं सोचता हूँ या करता हूँ उसमें एक घंटे की मुलाकात का बहुत बड़ा हाथ है।

मेरे हाथों में एक कमल का फूल था जो में खुद तालाब से तोड़ के लाया था और वही ले कर मैं रेल्वे स्टेशन पर अपनी छोटी बहिन और भाई के साथ घर जाने के लिए ट्रेन का इन्तजार कर रहा था कि इतने में उसने आकर पुछा " ये किस का फूल है ?"
मैं ने कहा " कमल का."
 वो बोली " नहीं ये तो चमेली का फूल है, मुझे देगा क्या?"
मैंने मना करते हुए कहा " ये तो मैं अपने घर के लिए ले जा रहा हूँ लेकिन ये है कमल का ही, मैं खुद तोड़ के लाया हूँ ."
वो बोली " हमारे गाँव मैं तो इसे चमेली का बोलते है."
मैं ने पुछा "कहाँ  की रहने वाली हो तुम ?"
"बंगाल " तपाक से उत्तर आया .
 इतने में ही उस की हमउम्र सहेली आ कर बोली " भैया ये झूठ बोल रही है। ये तो यहीं रहती है।
मैं ने पुछा "तुमने झूठ क्यों बोला?"
वो बोली "हमें पकड़ के ले गया तो तू?"
मैं बोला "नहीं मैं क्यों पकड़ने लगा तुम्हे?"
 "लेकिन लोग अच्छे नहीं होते ना पकड़ लिया तो ?"
मैं ने कहा " डरो मत मैं नहीं पकडूँगा, लेकिन तुम्हारा नाम तो बताओ ?"
वो बोली " मेरा नाम पायल है इस का नाम रेखा है और ये मेरा छोटा भाई है इसका नाम राकेश है।"
तब तक उस का 3 - 4 साल का भाई भी फटे कपड़ो मैं हाथ मैं कटोरा लिए मेरे पास आ चुका था।
तभी रेखा फिर बोली " झूठ बोल रही है फिर से इस का नाम काजल है और मेरा नाम सरस्वती है।"
 मैं थोडा गुस्सा दिखाते हुए बोला " झूठ बोलोगी तो मैं तुम से बात नहीं करूँगा।
 तो काजल बोली " अच्छा सॉरी अब नहीं बोलेंगे झूठ।"
तभी मैं ने पुछा "तेरे भाई के कटोरे मैं कौन से भगवान  की तस्वीर है?"
वो मासूमियत से बोली " हमें क्या पता ये तो ऐसे ही एक पेड़ के नीचे मिल गयी थी लेकिन इसे देख  कर लोग  पैसे दे देते है।"
मैं -        कितने पैसे कमा लेती हो दिन भर में ?
काजल - 70 - 80 रूपये
मैं -         क्या करती हो पैसे का ?
काजल -  मम्मी को दे देते हैं।
मैं -         क्यों तुम्हारे पापा नहीं कमाते?
काजल -  वो तो घर छोड़ के भाग गया।
मैं -         मम्मी क्या करती हैं?
काजल - घर चलाती है ना।
हमें तब तक भूख लगने लगी थी क्यों की सुबह से कुछ नहीं खाया था तो सोचा की परांठे निकल के खा लें, मैं ने फिर काजल से पुछा - खाना खाएगी?
काजल - नहीं, हम तो खा के आये हैं।
मैं -        हम ने तो सुबह से नहीं खाया।
काजल - ओह, हम तो दिन मैं 3 बार खाते है सुबह 8 बजे फिर 12 बजे फिर शाम को और बीच मैं कोई खिला दे        
              तो वो अलग।
मैं( एक परांठा आचार से लगा के देते हुए) - फिर तो ये ले ले, एक बार और सही।
झिझकते हुए उस ने ले लिया और हम साथ बैठ कर खाते रहे और ढेर सारी बातें करते रहे। इतने मैं एक पढ़ा लिखा आदमी आया और तेज आवाज में काजल से बोला - "क्यों चिपक रहे हो इन लोगो से, भिखमंगों ! भागो यहाँ से।"
मैं एक दम से बोला - " भाईसाहब बात मैं कर रहा हूँ आप को कोई मतलब?"
वो आदमी मुझे घूरते हुए चला गया। हम खाना खा चुके थे लेकिन माहौल थोडा बदल गया था। मैं ने फिर बात शुरू करने की कोशिश कि
मैं -        कितने टाइम से भीख मांग रहे हो?
काजल - पता नहीं जब से छोटे थे तब से
(एक 8 साल की बच्ची बोल रही थी कि जब से छोटे थे तब से, पता नहीं वो कब छोटी थी और कब बड़ी हो के घर सम्भाल  ने लगी।)
मैं -        भीख क्यों मांगती हो?
काजल कुछ रूआसी हो गयी थी शायद ये सवाल उसे पसंद नहीं आया था उससे खड़ा रहना मुश्किल हो रहा था। दीवार का सहारा लगते हुए बोली - भीख माँगना कोई आचा लगता है क्या? (तुरंत चहकते हुए बोली) लेकिन जब मैं और मेरा भाई बड़े हो जायेंगे ना तो हम मजदूरी करेंगे और खूब कमाएंगे, भीख नहीं मांगेंगे।

शायद हम तीनों भाई बहिन की आँखों से भी 1 - 2 बूँद निकल आई थी,  इस बात को मैं ने और नहीं बढ़ाया, मैं ने पुछा - गिनती आती है?
काजल - 30 तक आती है।
मैं(आश्चर्य करते हुए) - फिर 70 - 80 कैसे गिन लेती हो?
काजल - अरे, 30 - 30 कर के गिन लेंगे ना इतना भी नहीं पता तुझे?
मैं(हँसते हुए) - हाँ, ठीक बोला सॉरी। लेकिन अब तुम 50 तक गिनती सीखना मैं अगली बार मिलूँगा तो पूछुंगा
काजल - ठीक है।

इतने मैं ट्रेन आ गयी, काजल और सरस्वती ने झट से चढ़ के हमारे लिए सीट रोक ली और हम आराम से बैठ गए तो नीचे उतर कर बोली - भैया, बाय तू बढ़िया आदमी है।
मैं - मैं तेरे लिए अगली बार किताब ले कर आऊंगा लेकिन 50 तक गिनती याद करेगी तब।

हमारी ट्रेन चल दी और वो दोनों बच्चियां दूर तक भागते हुए हमें बाय बोलती रही जैसे कोई बहुत गहरा रिश्ता हो। मैं सोचता रह गया कि इस भीख मांगने वाली 8 साल की बच्ची ने मुझसे 1 रुपया भी नहीं माँगा और बदले में कितना कुछ दे गयी।
मन मैं सोचता हूँ कि दोबारा भीख मांगते कभी ना मिले फिर भी नजरें उसे कोटा स्टेशन पर ढूँढती रहती है।











Wednesday, September 7, 2011

ab kis ko kahu main....

आज घर से न निकलता तो अच्छा होता 
राहों पे न चलता तो अच्छा होता
क्या पता था जो लोग मिले थे वो यूँ बिछुड़ जायेंगे 
उन लोगों से न मिलता तो अच्छा होता

आज एक डर सा बैठने लगा है 
इन धमाकों में हर अपना सा बिछुड़ने लगा है
हर सांस थमने लगी है, लहू बिखरने लगा है
 अब किस को कहू मैं, हर दिया तो बुझने लगा है







Saturday, September 3, 2011

ye kis kranti ki shuruvat hai??

ये किस तूफ़ान से पहले की बात है ??
ये किस क्रांति की शुरुवात है ??
क्या ये दुनिया को बदलने की बात है ??
या फिर खुद सुधरने की शुरुवात है ??

ये भीड़ क्यों जमा है ??
वो तख्त पर माइक ले के क्यों खड़ा है ??
क्यों आज नारों से देश गूंजा है ??
क्या ये हमारे अन्दर की आवाज है ??

ये किस तूफ़ान से पहले की बात है ??
ये किस क्रांति की शुरुवात है ??


Wednesday, August 10, 2011

हर पल एक कसक सी जागती है 
ये किस्मत उस पल को कहा ले भागती है

बीते पलों को याद किया करता हूँ 
आने वाले पलों के सपने बुना करता हूँ
फिर कभी हँसता हूँ तो कभी रोया करता हूँ
क्या पता किस पल मैं मौत आती है 
इंसान के इरादों को झोंक चली जाती है

सीख रहा हूँ कुछ इस पल में जीना 
इस पल में हँसना इस पल में खिलना 
इस पल में करता हूँ इस पल में पाता हूँ
इस पल में सपनों को साकार बनाता हूँ
इस पल में तुष्टि है इस पल में सृष्टि है
ये पल ही जीवन में खुशियों की घुट्टी है.

Wednesday, July 27, 2011

kaha kho gayi

सोचता हूँ वो हंसी कहाँ गयी.....
वो मुस्कुराहट वो ख़ुशी कहाँ गयी......
वो खुशबू भरी फिजा कहाँ गयी...
और बसंत मे भी पतझड़ कैसे हो गयी....

सोचता हूँ ये क्या खो गया....
वो अपना पन कहाँ रह गया...
वो जिन्दगी बेमानी क्यों लगने लगी...
और हर बात परेशानी क्यों बन ने लगी...

सोचता हूँ कहा से ढूँढ कर लाऊं.....
वो खुशियों की बारिश को कैसे बरसाऊ....
वो पतझड़ के पत्तो से फिर से बाग़ लगाऊ...
और फिर से जियूं फिर से मुस्कुराऊ......